Homeछत्तीसगढ़छत्तीसगढ़ जिला कोरबा वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। यह पर्व ज्येष्ठ माह की अमावस्या या पूर्णिमा को अलग-अलग क्षेत्रों में मनाया जाता है।
छत्तीसगढ़ जिला कोरबा वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। यह पर्व ज्येष्ठ माह की अमावस्या या पूर्णिमा को अलग-अलग क्षेत्रों में मनाया जाता है।
इस दिन महिलाएं बरगद (वट) के वृक्ष की पूजा करती हैं और माता सावित्री एवं सत्यवान की कथा सुनती हैं। मान्यता है कि माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे।वट सावित्री व्रत क्यों मनाया जाता है?सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा प्राचीन समय में राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्विनी और पतिव्रता थीं। उन्होंने सत्यवान नामक राजकुमार को अपने पति के रूप में चुना। लेकिन ऋषियों ने बताया कि सत्यवान की आयु बहुत कम है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी।सावित्री ने यह जानने के बावजूद सत्यवान से विवाह किया और पूरी निष्ठा से उनका साथ निभाया। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु का समय आया, वे जंगल में लकड़ी काटने गए। वहीं सत्यवान की मृत्यु हो गई और यमराज उनके प्राण लेकर जाने लगे।सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं। उनकी बुद्धिमत्ता, तपस्या और पति के प्रति अटूट प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी, फिर उनका राज्य और अंत में संतान का वरदान मांगा। यमराज ने वरदान दे दिया। तब सावित्री ने कहा कि बिना पति के संतान कैसे होगी? यमराज उनकी चतुराई और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर सत्यवान को पुनर्जीवन दे दिए।तभी से वट सावित्री व्रत पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए मनाया जाता है।वट वृक्ष (बरगद) का महत्व बरगद के पेड़ को त्रिदेवों का प्रतीक माना जाता है :जड़ में ब्रह्मा जीतने में भगवान विष्णुशाखाओं में भगवान शिव का वास माना जाता है।यह वृक्ष लंबी आयु और अमरत्व का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए इसकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।वट सावित्री व्रत की पूजा सामग्रीपूजा के लिए सामान्यतः ये सामग्री रखी जाती है:वट (बरगद) वृक्षजल से भरा कलशरोली, कुमकुम, हल्दीअक्षत (चावल)फूल और मालाधूप, दीपफल और मिठाईभीगा हुआ चनासूत या कच्चा धागापंखा, श्रृंगार सामग्रीपूजा की थालीसावित्री-सत्यवान की तस्वीर या प्रतिमावट सावित्री व्रत की संपूर्ण पूजा विधि1. प्रातः स्नान और संकल्पसुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। सुहागिन महिलाएं श्रृंगार करती हैं। फिर व्रत का संकल्प लें।2. पूजा स्थल तैयार करेंबरगद के पेड़ के पास साफ-सफाई करके पूजा की तैयारी करें। यदि पेड़ उपलब्ध न हो तो उसकी तस्वीर का भी पूजन किया जा सकता है।3. कलश स्थापनाजल से भरा कलश स्थापित करें और भगवान विष्णु, माता सावित्री एवं सत्यवान का स्मरण करें।4. वट वृक्ष की पूजावट वृक्ष पर जल अर्पित करें। रोली, अक्षत, फूल चढ़ाएं और दीप-धूप जलाएं।5. धागा बांधनाबरगद के वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूत या धागा लपेटते हुए परिक्रमा करें। सामान्यतः 7 या 108 परिक्रमा की जाती है।6. व्रत कथा सुननासावित्री और सत्यवान की कथा श्रद्धापूर्वक सुनें या पढ़ें।7. आरती और प्रार्थनापूजा के अंत में आरती करें और पति की लंबी आयु एवं परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।8. दान-पुण्यजरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, फल या दक्षिणा देना शुभ माना जाता है।व्रत के नियमव्रत श्रद्धा और संयम से करें।कई महिलाएं निर्जला व्रत भी रखती हैं।क्रोध और विवाद से दूर रहें।सात्विक भोजन करें।पूजा के बाद ही व्रत खोलें।धार्मिक मान्यतामान्यता है कि वट सावित्री व्रत करने से:पति की आयु बढ़ती है।वैवाहिक जीवन सुखमय होता है।परिवार में सुख-समृद्धि आती है।अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।विशेष महत्वभारत के कई राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में यह पर्व बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। गांवों और शहरों में महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में वट वृक्ष की पूजा कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।