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छत्तीसगढ़ जिला कोरबा बांकी मोंगरा नगर पालिका परिषद में टेंडर विवाद बना सत्ता और सिस्टम पर बड़ा सवाल भाजपा नेता और ठेकेदार आमने-सामने, दोनों पक्षों ने दर्ज कराई एफआईआर, आम जनता के विकास कार्यों पर पड़ सकता है असर       

by Vimal Kumar
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संपादक विमल कुमार

बांकीमोंगरा नगर पालिका  परिषद में टेंडर विवाद बना सत्ता और सिस्टम पर बड़ा सवाल

भाजपा नेता और ठेकेदार आमने-सामने, दोनों पक्षों ने दर्ज कराई एफआईआर, आम जनता के विकास कार्यों पर पड़ सकता है असर

कोरबा। नगर पालिका परिषद बांकीमोंगरा में टेंडर प्रक्रिया को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय बन गया है। भाजपा से जुड़े एक जिला पदाधिकारी और स्थानीय ठेकेदार के बीच फोन पर हुई तीखी बातचीत ने इतना गंभीर रूप ले लिया कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ थाना बांकीमोंगरा में रिपोर्ट दर्ज करा दी। पुलिस ने फिलहाल दोनों मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 296 और 351(3) के तहत अपराध दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है।
मामले ने केवल व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रहकर नगर पालिका की कार्यप्रणाली, टेंडर सिस्टम में कथित दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप और सत्ता की कथित दबंगई जैसे गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि जनप्रतिनिधि और ठेकेदार आपसी संघर्ष और दबाव की राजनीति में उलझेंगे तो सबसे बड़ा नुकसान आम जनता और विकास कार्यों का होगा।
ठेकेदार ने लगाया दबाव और धमकी का आरोप
बांकीमोंगरा निवासी ठेकेदार प्रदीप अग्रवाल ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया है कि 18 मई 2026 को भाजपा जिला मंत्री सतीश झा ने फोन कर नगर पालिका के टेंडर वापस लेने का दबाव बनाया। मना करने पर गाली-गलौज, अपमानजनक भाषा और जान से मारने की धमकी दी गई।
प्रदीप का आरोप है कि उसे कहा गया कि “अब देखता हूं तुम नगर पालिका में कैसे घुसते हो, तुम्हारा बिल कैसे बनेगा और जिले में तुम्हें काम कैसे मिलेगा।” शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया कि उसकी दिवंगत माता के लिए भी आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया, जिससे परिवार को गहरा मानसिक आघात पहुंचा।
प्रदीप अग्रवाल का कहना है कि पिछले लगभग एक वर्ष से लगातार दबाव और मानसिक प्रताड़ना का माहौल बनाया जा रहा है, जिससे उसके व्यवसाय और परिवार की सुरक्षा को लेकर भय की स्थिति बनी हुई है।
भाजपा नेता ने पलटवार करते हुए लगाए ब्लैकमेल और कमीशन मांगने के आरोप
दूसरी ओर भाजपा जिला मंत्री एवं पूर्व मंडल अध्यक्ष सतीश झा ने भी प्रदीप अग्रवाल के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। सतीश झा के अनुसार टेंडर संबंधी चर्चा के दौरान प्रदीप अग्रवाल ने कथित रूप से टेंडर वापस लेने के एवज में 2 प्रतिशत कमीशन की मांग की। विरोध करने पर कथित गाली-गलौज की गई और राजनीतिक भविष्य खत्म करने की धमकी दी गई।
सतीश झा ने यह भी आरोप लगाया कि बातचीत की रिकॉर्डिंग कर उन्हें ब्लैकमेल करने और झूठे केस में फंसाने की धमकी दी गई। शिकायत में उन्होंने यह भी कहा कि प्रदीप अग्रवाल कथित रूप से ब्याज पर पैसा देने और लोगों के एटीएम व पासबुक अपने कब्जे में रखने जैसे कार्य करता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
टेंडर प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने नगर पालिका बांकीमोंगरा की टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि टेंडर को लेकर फोन पर दबाव, राजनीतिक हस्तक्षेप, कमीशन और धमकियों जैसी बातें सामने आ रही हैं तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत हैं।
नगर निकायों में टेंडर प्रक्रिया का उद्देश्य गुणवत्ता के साथ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना होता है, ताकि जनता के टैक्स का पैसा सही कार्यों में लगे। लेकिन यदि ठेकेदारों पर दबाव बनाकर टेंडर वापसी की कोशिश की जाती है या राजनीतिक प्रभाव का उपयोग होता है, तो इसका सीधा असर विकास कार्यों की गुणवत्ता और गति पर पड़ता है।
आम जनता को कैसे होता है नुकसान
विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों के अनुसार इस तरह के विवादों का सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ता है।
सड़क, नाली, पानी, बिजली और सफाई जैसे जरूरी कार्य प्रभावित होते हैं।
टेंडर विवाद के कारण विकास योजनाएं अधर में लटक जाती हैं।
योग्य ठेकेदार सिस्टम से दूर होने लगते हैं और केवल प्रभावशाली लोगों का वर्चस्व बढ़ता है।
कमीशनखोरी और दबाव की राजनीति से निर्माण कार्यों की गुणवत्ता गिरती है।
जनता का विश्वास प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से कमजोर होता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नगर पालिका को राजनीतिक अखाड़ा नहीं बल्कि जनसेवा का केंद्र बनना चाहिए। यदि सत्ता से जुड़े लोग ही दबाव और प्रभाव की राजनीति करेंगे तो निष्पक्ष प्रशासन की उम्मीद कमजोर पड़ जाएगी।
निष्पक्ष जांच की मांग तेज
मामले के सामने आने के बाद क्षेत्र में निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि केवल सामान्य धाराओं में मामला दर्ज कर औपचारिक कार्रवाई करने के बजाय कॉल रिकॉर्डिंग, टेंडर प्रक्रिया और कथित दबाव के पूरे नेटवर्क की जांच होनी चाहिए।
जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर नगर पालिका में टेंडर किस आधार पर दिए जाते हैं, किसका कितना प्रभाव है और क्या वास्तव में ठेकेदारों तथा जनप्रतिनिधियों के बीच दबाव और कमीशन का खेल चल रहा है।

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