कोरबा। 27 साल बाद भी पेंशन पॉलिसी की समीक्षा नहीं की गई है। कोयला खान पेंशन स्कीम 1998 तय अंशदान व लाभ के अंतर्गत आता है। लेकिन इस स्कीम में होने वाला अंशदान लाभ के अनुरूप नहीं है। साल 2005 से पहले सेवानिवृत्त कोयला कर्मियों को 1 हजार से भी कम पेंशन मिल रहा है। इसकी एक प्रमुख वजह एक्चुअरी की सिफारिश को अभी तक लागू नहीं किया जा सका है। कोल माइंस प्रोविडेंट फंड आर्गेनाइजेशन (सीएमपीएफओ) की ओर से नियुक्त एक्चुअरी हर तीन साल में पेंशन निधि का मूल्यांकन करती है।सीएमपीएफओ पेंशन निधि की उपलब्धता होने पर एक्चुअरी की सिफारिश पर केन्द्र सरकार के अनुमोदन से बोर्ड ऑफ ट्रस्टी (बीओटी) इस स्कीम के तहत देय अंशदान की दरों में संशोधन कर सकता है। यह रिपोर्ट विस्तृत विश्लेषण पर आधारित होता है। लेकिन एक्चुअरी की सिफारिश को प्रबंधन व यूनियन नेताओं के बीच बीओटी की बैठक में रखे जाने पर सहमति नहीं बन पाई है। 31 मार्च 1998 में लागू कोयला खान पेंशन स्कीम पहले कोल कर्मचारियों की ओर से पेंशन फंड में 4.91 प्रतिशत अंशदान किया जाता था। जिसे 1 अक्टूबर 2017 से पेंशन निधि में अंशदान को रिवाइज्ड कर 14 प्रतिशत कर दिया गया है। कर्मचारियों की ओर से 7 प्रतिशत और कोल इंडिया प्रबंधन 7 प्रतिशत अंशदान दे रही है। पहले कोयला कर्मचारी का ही अंशदान पेंशन फंड में जमा होता था। लेकिन पेंशन फंड की स्थिरता के लिए अब कोल इंडिया की भी सहभागिता है।
27 साल बाद भी पेंशन पॉलिसी की समीक्षा नहीं, कोयला कर्मियों को मिल रही 1 हजार से भी कम पेंशन
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